पहाड़ों की जिंदगी,पहाड़ की जैसी।

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पहाड़ों की जिंदगी,पहाड़ की जैसी ।    
पहाड़ों की जिंदगी,पहाड़ की जैसी जी हां यह बात सौ फ़ीसदी सच है बेशक मौजूदा सरकार अपने स्वास्थ्य सेवा  देने की लाख दावे करती जरूर है। लेकिन खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में यह दावे कोसों दूर ही नहीं खोखला साबित हुयी  है।  ऐसा ही बानगी देखने को मिली  बीते शनिवार यानि  8 फरवरी 2020 को ।  जनपद, चकराता के गांव कचाणु निवासी देवेंद्र सिंह की पत्नी को डिलीवरी होना था। लेकिन जब  मौजूदा सरकार की प्रशंसनीय 108 सेवा को,परिजनों ने फोन किया तो। घंटो तक एंबुलेंस मौके पर नहीं पहुंची। तब परिजनों ने थकहार कर पीड़ित महिला को डंडी कंडी के सहारे हॉस्पिटल  के लिए निकल पड़े। परंतु  जैसे ही महिला को आधे रास्ते ले जाया जा रहे थे  तभी महिला का प्रसव शुरू हो गया। जिसके बाद मौके पर जीवनदायनी कहे जाने वाली सेवा 108 भी वहां पहुँच गयी तबतक महिला का डिलीवरी हो चुकी थी। गनीमत यह रही कि महिला व् बच्चा सही सलामत थे। परंतु। हैरानी की बात यह है कि प्रदेशभर में ऐसी घटनाक्रम अक्सर होते रहते हैं ऐसी घटनाक्रम पूर्व में भी अनेकों बार घटना घटित हुए हैं। लेकिन स्वास्थ्य विभाग ऐसे घटनाओं से सबक सीखने को तैयार नहीं है।  उल्टा विभाग स्वास्थ्य व्यवस्था की चुस्त दुरुस्त होने की बात कहती हुयी नज़र आती है। और स्वास्थ्य सेवा के लिए लाखों रुपए महीने  पानी की तरह प्रचार प्रसार के लिए लुटाये जा रहे हैं । लेकिन स्वास्थ्य सेवा की सच्चाई किसी से छुपी नहीं है।  और स्वस्थ्य सेवा हमेशा ही विफल  साबित हुई है। चाहे, वह केंद्र की योजना आयुष्मान कार्ड हो या फिर अन्य स्वास्थ्य सेवाएं। हालात यह है कि आज भी  प्रदेशभर में लोग। स्वास्थ्य सेवाएं सरकारी के बजाय निजी चिकित्सालय में अधिक लेते नजर आते हैं। इसका मुख्य कारण है कि सरकारी अस्पतालों में उचित सुविधा का नहीं होना।    

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