भाजपा की सहानुभूति की राजनीति।

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भाजपा ने चाय वाले के नाम पर की सहानुभूति बटोरने की राजनीति।जहां सम्मान होते हैं कम,और अपमान होते हैं अधिक,ये है भाजपा का चरित्र।   जी हां यह बात सौ फीसदी सच है वर्षों तक सत्ता से दूर भजपा संगठन को सत्ता तक पहुंचाने वाला एक मात्र व्यक्ति था तो वो था सिर्फ और सिर्फ दिखावे के नाम का चाय वाला। यदि बाकय भाजपा की यह मंशा थी कि बीजेपी संगठन में एक निम्न स्तर के व्यक्ति भी देश की अहम पदों तक पहुंच सकता है,जिसका उदाहरण के तौर पर संगठन ने पेश किया पीएम नरेंद्र मोदी को। बेशक आज अकेले मोदी उस सपनो को भी पीछे छोड़ दिया,लेकिन देश का और कोई भी व्यक्ति इस पी एम के सपने को भी नहीं देख सकता। यह बात इसलिए सच है कि एक चाय वाला मोदी अपने पांच वर्ष पुरे करने के बाद दूसरे अपने पांच वर्षीय कार्यकाल के पड़ाव में तो जरूर है,लेकिन आज इन्ही मोदी से देश के लाखों चाय वाला सबाल भी कर रहा है ।  कि पीएम मोदी व भाजपा संगठन ने पिछले पांच वर्षों में कितने चाय वालों को संसद व विधायक के लिए टिकट दिय है। बाक़य यदि पार्टी की मंशा एक आम व गरीब को सत्ता के अंतिम छोड़ तक पहुंचाने की होती। तो निश्चित है भाजपा आज कम से कम हर राज्य में एक चाय वालों को टिकट देने का काम करती। लेकिन संगठन संसद व् विधायक तो दुर ग्राम पंचयात व ब्लॉक स्तर पर भी संगठन टिकट देने से पहले उसके हैसियत देखकर टिकट बांटती है। पार्टी का यही दोहरा चरित्र आज देश  के सामने है। यहां तक कि देहरादून में बीजेपी पार्टी ने अब दीपावली का उपहार बांटने में भी पारदर्शिता नहीं करती। और पार्टी लोगों को सम्मान के लिए बुलाती तो जरूर है पर उन्हें सम्मान के बदले अपमान करके अपने आयोजित कार्यक्रम से भेजने का काम करती है। तो ये है देश की सबसे बड़ी पार्टी का दोहरा चरित्र व कड़वा सच।  

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