5 लोग  से  160 किलोमीटर का सफर।  

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5 लोग स्कूटर से 160 किलोमीटर का सफर।  
12 मई की शाम 5 बजे कल्याण से चले। एक परिचित से पांच हजार रुपये उधार लेकर। पत्नी सुनीता, बेटी काजल (12),जाह्नवी (5) और बेटे शुभम (10) के साथ। दो बैग में कपड़े और थोड़े-से बिस्कुट और नमकीन लेकर। रात में 1 बजे जलगांव बस स्टेशन परिसर में सोए। सुबह फिर चले और रात तक इंदौर पहुंचे। यहां पेट्रोल पंप में ठिकाना मिला। अगली रात झांसी में एक मंदिर में कटी। अगले पड़ाव कानपुर में एक पेट्रोल पंप में शरण मिली। अंतिम पड़ाव अयोध्या था,जहां एक मंदिर ने उन्हें ठहरने की जगह दी। अयोध्या से वह आजमगढ़ होते हुए दोहरीघाट पहुंचे। वहां से बड़हलगंज के पटना चौराहे पर वह रात दो बजे पहुंचे। दो महीने तक मलेरिया से तप कर कमजोर हुआ बदन। उस पर 1650 किलोमीटर लंबे सफर की मजबूरी। बीवी और तीन बच्चों के साथ स्कूटी पर। कितना मुश्किल रहा होगा महाराष्ट्र के कल्याण से गोरखपुर के गांव फरसाड़ तक पहुंचना। देवनारायण यादव ने यह हिम्मत की। छह दिन स्कूटी चलाकर वह गांव पहुंचे तो पत्नी-बच्चे थक कर चूर हो चुके थे। लेकिन देव को पूरी रात नींद नहीं आई। थकान के बावजूद। उनकी आंखों में लंबे,सूने,काले हाईवे की छाया के सिवा बस आंसू थे। हे भगवान! तुम्हारी दुनिया में इतनी तकलीफें हैं … और उससे भी ज्यादा अच्छे लोग। देवनारायण के इस सफर ने तमाम गलतफहमियां साफ कर दी हैं। सफर में उनका वास्ता तीन प्रदेशों के 15 जिलों के सैकड़ों लोगों से पड़ा। ऐसा लगा जैसे हर आदमी उनकी मदद के लिए वहां था। खासकर मध्यप्रदेश में। जहां हर 20-25 किलोमीटर पर लोग भोजन कराते मिले। महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में जरूर उन्हें दो बार भोजन की जगह बिस्किट खाकर काम चलाना पड़ा। देवनारायण कहते हैं ‘चलने से पहले मैं डर रहा था। रास्ते में चोर-लुटेरे मिल सकते हैं। पुलिस परेशान करेगी। ढाबे बंद होंगे तो क्या खाएंगे? लेकिन छह दिन-पांच रातें सड़क पर काट कर लगा, दुनिया मददगारों से भरी है। मैं एक बड़ी पॉलीथिन लेकर चला था। रात में हम सब कहीं पेट्रोलपंप में सोए तो कहीं मंदिर में। ज्यादातर जगह स्थानीय लोगों ने भोजन दिया। पानी पिलाया। जगह और सुरक्षा दी।दो महीने तक मलेरिया से तप कर कमजोर हुआ बदन। उस पर 1650 किलोमीटर लंबे सफर की मजबूरी। बीवी और तीन बच्चों के साथ स्कूटी पर। कितना मुश्किल रहा होगा महाराष्ट्र के कल्याण से गोरखपुर के गांव फरसाड़ तक पहुंचना। देवनारायण यादव ने यह हिम्मत की। छह दिन स्कूटी चलाकर वह गांव पहुंचे तो पत्नी-बच्चे थक कर चूर हो चुके थे। लेकिन देव को पूरी रात नींद नहीं आई। थकान के बावजूद। उनकी आंखों में लंबे, सूने, काले हाईवे की छाया के सिवा बस आंसू थे। हे भगवान!तुम्हारी दुनिया में इतनी तकलीफें हैं और उससे भी ज्यादा अच्छे लोग। देवनारायण के इस सफर ने तमाम गलतफहमियां साफ कर दी हैं। सफर में उनका वास्ता तीन प्रदेशों के 15 जिलों के सैकड़ों लोगों से पड़ा। ऐसा लगा जैसे हर आदमी उनकी मदद के लिए वहां था। खासकर मध्यप्रदेश में। जहां हर 20-25 किलोमीटर पर लोग भोजन कराते मिले। महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में जरूर उन्हें दो बार भोजन की जगह बिस्किट खाकर काम चलाना पड़ा। देवनारायण कहते हैं- ‘चलने से पहले मैं डर रहा था। रास्ते में चोर-लुटेरे मिल सकते हैं। पुलिस परेशान करेगी। ढाबे बंद होंगे तो क्या खाएंगे? लेकिन छह दिन-पांच रातें सड़क पर काट कर लगा, दुनिया मददगारों से भरी है। मैं एक बड़ी पॉलीथिन लेकर चला था। रात में हम सब कहीं पेट्रोलपंप में सोए तो कहीं मंदिर में। ज्यादातर जगह स्थानीय लोगों ने भोजन दिया। पानी पिलाया। जगह और सुरक्षा दी।

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